बुनियादी तौर पर मैं __रस , रंग , कविता और अभिनय के फोर्स व फ्लेवर से संचालित रहा हूँ । मेरी किसी भी किसिम की रचनात्मकता में __समय , समाज और सभ्यता का स्पष्ट वेग रहा है । __अपने पहले कृतित्व __स्व संपादित ' इन्द्रधनुष ' ( सन १९७५ में संपादित-प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ) और बाद में मुम्बई के दौर में __हिन्दी एक्सप्रेस, श्री वर्षा, करंट और धर्मयुग के सम्पादकीय-कर्म में ये गुण-तत्व बराबर निखार पाते रहे । चक्रम और मेट्रो टाइम (ये दोनों अखबार क्रमश जून १९८७ , इलाहबाद और मई १९९१, दिल्ली ) के दौरान ये और निखार पर आए ।
लेखन-सम्पादन से ज्यादा मेरी रुचि __कांसेप्ट, प्लानिंग, लेआउट और प्रेजेंटेशन में रही __जिसका भरपूर प्रवाह राष्ट्रीय सहारा के ' उमंग ' और ' खुला पन्ना ' में १९९१ से १९९५ तक प्रर्दशित है ।
भाषा की रवानी , कथ्य की कहानी , आकषर्क फोटो और ग्राफिक्स से सजे ...धर्मयुग , करंट , राष्ट्रीय सहारा के उमंग और खुला पन्ना के वे पन्ने हालाँकि इतिहास के झरोखे से उन लोगों के जेहन में अभी भी झांकते हैं जो उस दौर के हिन्दी-प्रवाह के साथ आँख खोल कर चले और आज भी अतीत की उस श्रेष्ठता को सराहने में झेंपते नहीं ।...और मैं ...मैं तो बेचैन हूँ ...नए कैनवास की तलाश में ...जहाँ फ़िर पत्रकारिता का नया बसंत रचा जा सके ।
कागज़ हो , कैनवास हो , पिक्चर ट्यूब हो या वेब जनित नया मोर्चा __प्रक्षेपण का आगाज हो तो __नए और समयाकूल तीर अभी भी तैयार हैं __नई इबारत लिखने के लिए !
डॉ . धर्मवीर भारती , डॉ महावीर अधिकारी , शरद जोशी का सानिध्य और रचना-संजाल अभी भी जीवंत है !...धारदार है ! !
...अपनी सोच , समझ और अभिव्यकि्त की क्षमता __रस, रंग, कविता और अभिनय के फोर्स और फ्लेवर से अभी भी लबरेज और तरोताजा है ।
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